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एक रुपये का सिक्का: निर्माण लागत वास्तविकता से अधिक?

भारत में एक रुपये का सिक्का बनाने में आने वाली लागत को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। क्या वाकई इसके निर्माण में सिक्के के मूल्य से अधिक खर्च होता है, इसे जानने के लिए आवश्यक है इस प्रक्रिया को समझना।

LSN India · 13 October 2026

एक रुपये का सिक्का: निर्माण लागत वास्तविकता से अधिक?

भारतीय मुद्रा प्रणाली में एक रुपये का सिक्का एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि इस सिक्के को ढालने में इसके वास्तविक मूल्य से कहीं अधिक खर्च आता है। यह विरोधाभास न केवल आर्थिक दृष्टिकोण से दिलचस्प है बल्कि सार्वजनिक नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है।

सिक्का निर्माण की प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं। धातु की खरीद, डिजाइनिंग, मोल्डिंग, छापना और गुणवत्ता नियंत्रण जैसे काम में काफी खर्च आता है। इसके अलावा कर्मचारियों की मजदूरी, बिजली, रखरखाव और परिवहन लागत भी जुड़ती है। ये सभी खर्च जब एक साथ जोड़े जाते हैं तो अक्सर एक रुपये से अधिक हो जाते हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक और भारत सरकार इस मुद्दे के प्रति सचेत रहे हैं। हालांकि, एक रुपये के सिक्के को चलन में रखना आवश्यक माना जाता है क्योंकि यह कम मूल्य के लेनदेन के लिए अपरिहार्य है। इस प्रकार, आर्थिक दक्षता की बजाय सामाजिक और व्यावहारिक आवश्यकता को प्राथमिकता दी जाती है।

इस विसंगति को कम करने के लिए सरकार समय-समय पर उत्पादन प्रक्रियाओं में सुधार और लागत में कटौती की कोशिश करती रहती है। फिर भी, छोटे मूल्य के सिक्कों की वास्तविक निर्माण लागत उनके नाममात्र मूल्य से अधिक रहने की प्रवृत्ति विश्वव्यापी मुद्रा प्रणाली में एक ज्ञात समस्या है।