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उदारीकरण के 35 साल बाद भारत के नियामक ढांचे में सुधार की जरूरत
भारत के आर्थिक सुधार के तीन दशक पूरे हो गए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि नियामक संस्थाओं को अधिक स्वतंत्र, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना होगा। बाजार और नियामकों के परिपक्व होने के साथ ही इस दिशा में कदम उठाना आवश्यक हो गया है।
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1990 में भारत ने आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाई थी, जिसने देश के व्यावसायिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। तीन दशकों की इस यात्रा में भारत ने एक मजबूत नियामक ढांचा विकसित किया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसमें और सुधार की गुंजाइश है।
वर्तमान समय में भारत के नियामक संस्थानों को अधिक स्वतंत्रता के साथ काम करना चाहिए। इसके साथ ही पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों को मजबूत करना जरूरी है। बेहतर नियामक व्यवस्था से निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा और बाजारों का विकास तेजी से होगा।
बाजार की परिपक्वता के साथ-साथ नियामकीय संस्थाओं को भी विकसित होना चाहिए। स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता, नीतिगत स्पष्टता और प्रभावी निरीक्षण व्यवस्था आधुनिक नियामक ढांचे के मुख्य स्तंभ हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था की बदलती गतिविधियों के अनुरूप नियामक तंत्र को भी लगातार विकसित होना पड़ेगा। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि विभिन्न क्षेत्रों के नियामक निकाय आजादी के साथ जिम्मेदारी से काम करें और बाजार के सभी हिस्सेदारों के हितों का संरक्षण करें।