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रूसी तेल आयात: यूक्रेन संकट से ट्रम्प के दौर तक भारत की नीति
अमेरिकी सांसदों ने भारत को रूस प्रतिबंध विधेयक में शामिल करने की कोशिश की है, जिससे भारत के रूसी तेल व्यापार पर दोबारा ध्यान केंद्रित हो गया है। मास्को के यूक्रेन आक्रमण के बाद से इस व्यापार में कैसे बदलाव आया है, जानिए विस्तार से।
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संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ सांसदों द्वारा रूस के विरुद्ध प्रतिबंध संबंधी एक विधेयक में भारत को शामिल करने के लिए किए जा रहे प्रयासों ने भारत के रूसी तेल आयात पर पुनः ध्यान आकर्षित किया है। भारत रूस से सस्ते तेल की खरीद के लिए जाना जाता रहा है, विशेषकर उस समय जब फरवरी 2022 में मास्को ने यूक्रेन पर आक्रमण किया था।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों ने इसे वैश्विक प्रतिबंधों के बीच भी रूसी तेल के प्रमुख क्रेता के रूप में स्थापित किया है। युद्ध के बाद की अवधि में, भारत ने रूस से सस्ती कीमतों पर कच्चे तेल की खरीद में वृद्धि की है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को काफी फायदा हुआ है। यह व्यापार भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
हालांकि, अमेरिकी दबाव और नई भू-राजनीतिक परिस्थितियां भारत की इस नीति को चुनौती दे सकती हैं। डोनाल्ड ट्रम्प के राजनीतिक उदय के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों में नई गतिविधियां दिख रही हैं, जिसका असर भारत के रूसी तेल आयात पर भी पड़ सकता है।
भारत सरकार ने अब तक रूस के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं के आधार पर संचालित किया है। लेकिन आने वाले समय में भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना होगा, साथ ही अपनी ऊर्जा सुरक्षा को भी सुनिश्चित करना होगा।