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दस साल का डेटा: क्या नोटबंदी से बढ़ा भारत का कर आधार?
भारत के करदाताओं की संख्या दोगुनी हुई है और प्रत्यक्ष कर संग्रह तीन गुना बढ़ा है। लेकिन इस वृद्धि में नोटबंदी की कितनी भूमिका रही, यह सवाल अब तक विवादास्पद रहा है।
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भारत के राजस्व संग्रह में पिछले दशक में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। करदाताओं की संख्या दोगुनी होने और प्रत्यक्ष कर संग्रह में तीन गुना इजाफे के साथ, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि 2016 की नोटबंदी नीति का इसमें कितना योगदान रहा।
नोटबंदी के बाद सरकार ने डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने और काला धन पर नियंत्रण के लिए विभिन्न कदम उठाए थे। इसके साथ ही जीएसटी लागू करने और आयकर विभाग की निगरानी क्षमता में सुधार जैसी नीतियां लागू की गईं। ये सभी कारक कर आधार के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए हैं।
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि कर राजस्व वृद्धि एकमात्र नोटबंदी का परिणाम नहीं है। आर्थिक विकास, औपचारिकरण की प्रक्रिया और बेहतर कर प्रशासन जैसे अन्य कारक भी इसके पीछे हैं। पिछले दस वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था के विस्तार और डिजिटलीकरण के साथ-साथ सरकार की सुदृढ़ कर नीतियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आंकड़ों का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि करदाता संख्या और राजस्व संग्रह की बढ़ोतरी बहु-कारकीय है। नोटबंदी निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण घटना थी, लेकिन इसे अकेले इस वृद्धि के लिए जिम्मेदार ठहराना अधूरा विश्लेषण होगा।