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प्रदूषक वाहन नियंत्रण में नहीं, पीयूसी नियमों के बावजूद चिंता बरकरार
कार्बन मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे हानिकारक प्रदूषकों का उत्सर्जन जारी है, जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। सरकारी प्रयासों और इलेक्ट्रिक वाहन योजनाओं के बावजूद समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।
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देश भर में प्रदूषणकारी वाहनों पर अंकुश लगाने के लिए सरकारी प्रयासों के बाद भी वायु प्रदूषण का संकट कम नहीं हो रहा है। कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कणों का उत्सर्जन मानव स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, जबकि सड़कों पर ऐसे वाहन बेरोकटोक चलते दिख रहे हैं।
केंद्र और राज्य सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए आकर्षक वित्तीय योजनाएं और सब्सिडी प्रदान कर रही हैं। हालांकि, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसी) के सख्त नियमों के बाद भी पुरानी और खराब हालत वाली गाड़ियां नियमित रूप से सड़कों पर चलती देखी जाती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पीयूसी जांच प्रक्रिया में कमजोरियां और अनुपालन में शिथिलता इस समस्या का मुख्य कारण है। वाहन प्रदूषण के विरुद्ध कड़े कानून मौजूद होने के बाद भी इनका प्रभावी क्रियान्वयन चिंताजनक बना हुआ है।
पर्यावरण विभाग द्वारा नियंत्रण प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही है। शहरों में बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए न केवल नई प्रौद्योगिकी बल्कि कड़ी निगरानी और दंडात्मक कार्रवाई भी अपरिहार्य बताई जा रही है।