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भारत-अमेरिका बांड यील्ड स्प्रेड 22 साल के न्यूनतम स्तर पर बना हुआ
भारतीय रिजर्व बैंक की दरें बढ़ने के बाद भी अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी से वृद्धि के कारण दोनों देशों के बीच का अंतर न्यूनतम बना हुआ है। विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बांडों में निवेश की आकर्षणीयता कम हो रही है और रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।
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भारतीय और अमेरिकी बांड यील्ड के बीच का अंतर दो दशक के न्यूनतम स्तर के निकट बना हुआ है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल में अपनी नीतिगत दरों में वृद्धि की है, लेकिन अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में और भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, जिससे यह अंतराल बना रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए भारतीय ऋण बाजार की अपील को कम कर रही है। जब अमेरिकी बांड से अधिक रिटर्न मिलने लगता है, तो वैश्विक निवेशक भारतीय प्रतिभूतियों से अपने फंड हटाने के लिए प्रेरित होते हैं।
यह प्रवृत्ति भारतीय रुपये पर क्रमिक दबाव डाल रही है। विदेशी पूंजी के बहिर्गमन से स्थानीय मुद्रा को कमजोरी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे आयात की लागत बढ़ सकती है और मुद्रास्फीति से संबंधित चिंताएं बढ़ सकती हैं।
वर्तमान परिदृश्य में भारतीय नीति निर्माताओं को वैश्विक ब्याज दर परिवेश में परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीति तैयार करनी होगी। विदेशी निवेश को आकर्षित करने और रुपये को स्थिर रखने के लिए आर्थिक नीतियों का संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।