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भारतीय कंपनियों ने सुधार दशक में भी R&D खर्च नहीं बढ़ाया
भारत की कुल अनुसंधान और विकास खर्च वित्त वर्ष 2026 में मात्र 7.2 अरब डॉलर रही, जबकि अकेले गूगल की मूल कंपनी अल्फाबेट 2025 में 61 अरब डॉलर खर्च कर गई। यह अंतराल भारतीय उद्योग की नवाचार में निवेश की कमजोर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
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भारतीय कंपनियों ने 1990 के दशक की आर्थिक सुधार नीति के बाद भी अनुसंधान और विकास में पर्याप्त निवेश नहीं किया है। वित्त वर्ष 2026 में समस्त भारतीय उद्योग का R&D खर्च 7.2 अरब डॉलर तक सीमित रहा। इसकी तुलना में, अमेरिकी प्रযुक्ति दिग्गज अल्फाबेट अकेले 2025 में 61 अरब डॉलर R&D पर व्यय करता है।
यह विशाल अंतराल भारतीय कंपनियों की नवाचार क्षमता विकसित करने के प्रति सीमित प्रतिबद्धता को उजागर करता है। तीन दशक से अधिक समय की उदारीकरण नीति के बाद भी, भारतीय निजी क्षेत्र को R&D गतिविधियों में आवश्यक निवेश नहीं दिखाई दे रहा है। यह स्थिति देश की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए एक चिंता का विषय है।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि भारतीय कंपनियां तकनीकी नवाचार में पर्याप्त निवेश नहीं करेंगी तो वे वैश्विक बाजार में पिछड़ सकती हैं। सरकार और उद्योग दोनों को R&D को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। इसके अलावा, कुशल जनशक्ति की उपलब्धता और अनुसंधान संस्थानों में सुधार भी जरूरी है।
इस समस्या का समाधान करने के लिए भारत को अपने R&D बजट में नाटकीय वृद्धि करनी होगी। केवल ऐसा करने से ही भारतीय कंपनियां वैश्विक तकनीकी नेतृत्व हासिल कर सकेंगी और दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित कर सकेंगी।