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सरकारी चिकित्सा शिक्षा के बाद डॉक्टर बॉन्ड से नहीं बच सकते: उच्च न्यायालय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि सरकारी संस्थानों से रियायती दरों पर स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा लेने वाले डॉक्टर अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड से मुक्त नहीं हो सकते। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक देरी से बॉन्ड की बाध्यता स्वतः समाप्त नहीं होती।
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लखनऊ में सोमवार को न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति अब्धेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह निर्णय दिया। अदालत ने कहा कि दो वर्ष की अनिवार्य सरकारी सेवा की शर्त सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और रोगियों के जीवन के अधिकार की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
यह मामला डॉ अपरूपा सेन गुप्ता की याचिका से संबंधित है, जिन्होंने लखनऊ के एसजीपीजीआई से ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन में एमडी की डिग्री प्राप्त की थी। डॉ गुप्ता का तर्क था कि चूंकि सरकार ने अपने कोर्स पूरा करने के तीन महीने के भीतर उन्हें कोई पद नहीं दिया, इसलिए दो वर्षीय अनिवार्य सरकारी सेवा बॉन्ड स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए।
न्यायालय ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि प्रशासनिक देरी या पद न मिलने का अर्थ बॉन्ड की बाध्यता को समाप्त करना नहीं है। अदालत ने कहा कि सरकारी संस्थानों से रियायती दरों पर शिक्षा लेने के बाद डॉक्टर अपनी बाध्यताओं से बचकर निजी क्षेत्र में नहीं जा सकते। यह निर्णय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के प्रति सरकारी चिकित्सकों की जिम्मेदारी को मजबूत करता है।