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कन्नूर से आर्कटिक तक: भारतीय शोधकर्ता प्रदूषकों का करेंगे अध्ययन
भारतीय आर्कटिक अभियान के तहत GITAM के शोधकर्ता मनोज पनायमथट्टा रायरोथ स्वालबार्ड में जैविक प्रदूषकों के रूपांतरण का अध्ययन कर रहे हैं। वे बर्फ से समुद्र तक प्रदूषकों के प्रवाह को समझने के लिए डेटा एकत्र कर रहे हैं।
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कन्नूर से आर्कटिक महासागर तक की यात्रा पर निकले एक भारतीय शोधकर्ता वैश्विक पर्यावरण प्रदूषण की गंभीर समस्या पर प्रकाश डाल रहे हैं। GITAM विश्वविद्यालय के शोधकर्ता मनोज पनायमथट्टा रायरोथ भारतीय आर्कटिक अभियान 2026-27 के अंतर्गत स्वालबार्ड क्षेत्र में जैविक प्रदूषकों का विस्तृत अध्ययन कर रहे हैं।
रायरोथ स्वालबार्ड के फजोर्ड जल और ग्लेशियर के पिघलते पानी से नमूने एकत्र कर रहे हैं। इस शोध का उद्देश्य यह समझना है कि जैविक प्रदूषक बर्फ में कैसे रूपांतरित होते हैं और अंततः समुद्र तक कैसे पहुंचते हैं। यह अध्ययन आर्कटिक क्षेत्र में प्रदूषण के वैश्विक प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
भारतीय आर्कटिक अभियान का यह प्रयास दूरस्थ ध्रुवीय क्षेत्रों में पर्यावरणीय गिरावट के बारे में वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करेगा। शोध के परिणाम आर्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र पर जलवायु परिवर्तन और मानवजनित प्रदूषण के प्रभाव को समझने में सहायता करेंगे।
स्वालबार्ड का यह अभियान भारत की वैज्ञानिक दक्षता और ध्रुवीय अनुसंधान में बढ़ती भागीदारी का प्रमाण है। इस तरह के अध्ययन वैश्विक जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण नियंत्रण नीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।