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कॉलेजियम के खिलाफ शोर सरकार की नाकामी छिपाने का प्रयास: जस्टिस दत्ता
न्यायाधीश दत्ता ने कहा कि कॉलेजियम व्यवस्था की आलोचना सरकार की विफलताओं को ढंकने का कमजोर प्रयास है। वहीं, जस्टिस शर्मा का मानना है कि सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणियां कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना नहीं थीं।
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भारतीय न्यायपालिका में कॉलेजियम प्रणाली को लेकर गहरे मतभेद सामने आ गए हैं। जस्टिस दत्ता का कहना है कि न्यायिक नियुक्तियों की वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध उठाई जा रही आवाजें सरकार की प्रशासनिक नाकामियों और जिम्मेदारियों से ध्यान हटाने का एक कमजोर प्रयास हैं।
हालांकि, इसी मामले पर जस्टिस शर्मा की अलग राय है। उन्होंने कहा कि सॉलिसिटर जनरल द्वारा की गई हाल की टिप्पणियां कॉलेजियम प्रणाली की सीधी आलोचना नहीं मानी जानी चाहिए। उनका दृष्टिकोण है कि ये बयान वर्तमान न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया के बारे में केवल तकनीकी सुझाव हैं।
कॉलेजियम प्रणाली भारत में उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार है। इस व्यवस्था को लेकर लंबे समय से संवैधानिक विशेषज्ञों और सरकार के बीच विवाद बना हुआ है। प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर विभिन्न विचार सामने आते रहे हैं।
जस्टिस दत्ता की टिप्पणी इस बात को दर्शाती है कि न्यायिक जगत में भी इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विविध विचार हैं। दोनों न्यायाधीशों के अलग-अलग दृष्टिकोण कॉलेजियम व्यवस्था की कार्यप्रणाली को लेकर विचार-विमर्श को आगे बढ़ाने का संकेत देते हैं।