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न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम की भूमिका सीमित, अन्य निर्णय लेते हैं
भारतीय न्यायपालिका में कॉलेजियम प्रणाली के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर बड़े सवाल उठ रहे हैं। माना जाता है कि 'न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं', लेकिन वास्तविकता यह है कि कॉलेजियम सिर्फ सिफारिशें करता है और अंतिम निर्णय दूसरे माध्यमों से होते हैं।
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भारत की न्यायिक नियुक्ति प्रणाली में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा जा रहा है जहां कॉलेजियम की भूमिका पुनर्परिभाषित हो गई है। परंपरागत रूप से माना जाता था कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों का कॉलेजियम न्यायाधीशों की नियुक्ति स्वतंत्र रूप से करता है, लेकिन वर्तमान प्रणाली में यह केवल सिफारिशों तक सीमित रह गया है।
कॉलेजियम की संरचना और कार्यप्रणाली के विश्लेषण से पता चलता है कि न्यायाधीशों का चयन करने के बाद भी अंतिम निर्णय अन्य संस्थानों और निकायों के हाथों में चला जाता है। यह प्रक्रिया बार-बार संस्तुति देने, फिर से विचार करने और पुनर्व्यवस्था करने के चक्र में फंसी हुई है। इससे न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत को चुनौती मिल रही है।
विधिवेत्ताओं और न्यायविदों का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में कॉलेजियम की सिफारिशों को मानना अनिवार्य नहीं रह गया है। सरकारी एजेंसियां और अन्य प्राधिकारी इन सिफारिशों को संशोधित या अस्वीकार कर सकते हैं। इससे न्यायपालिका की स्वायत्तता के सिद्धांत में कमजोरी आ गई है।
इस स्थिति ने न्यायिक नियुक्तियों के प्रति जनता का विश्वास प्रभावित किया है। न्यायपालिका की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कॉलेजियम प्रणाली को मजबूत करने या उसे संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने की मांग उठने लगी है।