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आरक्षण जनसंख्या के अनुपात में नहीं हो सकता: कर्नाटक उच्च न्यायालय
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा है कि जातियों की जनसंख्या को आरक्षण का आधार मानना समानता के सिद्धांत को नष्ट करने वाला होगा। न्यायालय का यह निर्णय आरक्षण नीति की संवैधानिकता पर महत्वपूर्ण प्रश्नचिह्न लगाता है।
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कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि आरक्षण का आवंटन किसी जाति की जनसंख्या के अनुपात में नहीं किया जा सकता। न्यायालय के अनुसार, इस तरह का दृष्टिकोण संविधान में निहित समानता के मूलभूत सिद्धांत के विरुद्ध होगा।
न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि जनसंख्या को आरक्षण का आधार बनाना समता-प्रणाली के लिए "विनाशकारी" साबित होगा। इस विषय पर उच्च न्यायालय का यह दृष्टिकोण संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मंतव्य है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में अल्पसंख्यक और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इन प्रावधानों के अंतर्गत आरक्षण नीति को तैयार करते समय विभिन्न सामाजिक और शैक्षणिक मानकों पर विचार किया जाता है।
यह निर्णय उन मामलों में प्रासंगिक है जहां आरक्षण नीति के दायरे को लेकर कानूनी चुनौतियां दी जाती हैं। कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह विचार आने वाले समय में समान मुद्दों पर विचार करने वाली अन्य अदालतों के लिए भी मार्गदर्शक हो सकता है।