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अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय से जाति प्रमाण की मांग में नरमी दिखाएं: केरल उच्च न्यायालय
केरल उच्च न्यायालय ने कहा है कि अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के सदस्यों को संवैधानिक सुविधाएं देने से इंकार केवल स्पष्ट धोखाधड़ी के मामलों में ही किया जाना चाहिए। न्यायालय ने माना कि ऐसी धोखाधड़ी को राज्य के पास स्वतंत्र रूप से उपलब्ध सामग्री के जरिए साबित किया जाना चाहिए।
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केरल उच्च न्यायालय ने सरकारी प्राधिकारियों को अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के सदस्यों से जाति प्रमाण की मांग करते समय उदार दृष्टिकोण अपनाने के लिए निर्देश दिए हैं। न्यायालय का मानना है कि संवैधानिक रूप से गारंटीशुदा सुविधाओं से इंकार करना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही उचित है।
इस संदर्भ में, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी का संदेह होने पर भी उसे साबित करने की जिम्मेदारी राज्य पर होनी चाहिए। किसी व्यक्ति को अनुसूचित जाति या जनजाति की सुविधाओं से वंचित करने से पहले राज्य के पास ऐसी दृढ़ सामग्री होनी चाहिए जो स्वतंत्र स्रोतों से प्राप्त हो।
न्यायालय के इस फैसले से अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों को संवैधानिक सुविधाओं का लाभ उठाने में आसानी होगी। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अनावश्यक कठोरता न दिखाई जाए।
यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि संवैधानिक सुरक्षा उपाय केवल वास्तविक धोखाधड़ी के मामलों में ही सीमित किए जाने चाहिए। राज्य को ऐसे किसी भी संदेह को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे जिससे पात्र लोग अपने वैध अधिकारों से वंचित न रहें।