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केरल हाईकोर्ट ने दंपति को बच्चे को बाल कल्याण समिति को सौंपने की अनुमति दी
केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि कोई दंपति जन्म के बाद बच्चे को रखने का इरादा नहीं रखता है, तो वह उसे बाल कल्याण समिति को सौंप सकता है। यह मामला एक बच्चे से संबंधित है जो कंकाल संबंधी विकार से जन्मजात है।
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केरल उच्च न्यायालय ने एक संवेदनशील प्रकरण में निर्णय दिया है जहां एक दंपति ने कंकाल संबंधी विकार (स्केलेटल डिसप्लेशिया) से पीड़ित बच्चे को जन्म के बाद बाल कल्याण समिति को सौंपने की अनुमति मांगी थी।
न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि चूंकि माता-पिता का इरादा बच्चे को जन्म के बाद अपने साथ रखने का नहीं है, वे उसे बाल कल्याण समिति के हवाले कर सकते हैं। इस फैसले में न्यायालय ने माता-पिता की व्यक्तिगत परिस्थितियों और बच्चे के सर्वश्रेष्ठ हित को ध्यान में रखा।
कंकाल संबंधी विकार जन्मजात हड्डी के विकास से संबंधित एक गंभीर स्वास्थ्य स्थिति है। न्यायालय के इस निर्णय को परिवार कानून और बाल संरक्षण के मामलों में एक महत्वपूर्ण पूर्वाधिकार माना जा रहा है।
बाल कल्याण समिति ऐसे बच्चों की देखभाल, पालन-पोषण और भविष्य के सुरक्षित भविष्य के लिए जिम्मेदार होती है। इस निर्णय से संबंधित मामलों में बाल संरक्षण कानून और माता-पिता के अधिकारों की सीमाओं के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं।