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कच्छ में ऊंटों की आबादी में तेजी से गिरावट, विलुप्त होने का खतरा
भारत के सबसे बड़े जिले कच्छ में औद्योगीकरण और खनन के कारण ऊंटों की संख्या में भारी कमी आई है। एक समय हजारों ऊंटों का घर रहा यह क्षेत्र अब इन पशुओं के पूरी तरह विलुप्त हो जाने का संकट झेल रहा है।
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गुजरात के कच्छ जिले में ऊंटों की आबादी तेजी से घट रही है। औद्योगिक विकास और खनन गतिविधियों के विस्तार से चराई की जमीन सिकुड़ती जा रही है, जिससे इन पशुओं के लिए भोजन और आश्रय की कमी हो गई है।
कच्छ, जो भारत का सबसे बड़ा जिला है, कभी हजारों ऊंटों का प्रमुख पालन क्षेत्र था। ये पशु स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे और रेगिस्तानी इलाके की पहचान से जुड़े थे। मगर पिछले कुछ दशकों में विकास परियोजनाओं और खनन कार्यों ने इस स्थिति को तेजी से बदल दिया है।
चराई के मैदानों में लगातार कमी से पशुपालकों के सामने गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। औद्योगीकरण की वजह से प्राकृतिक संसाधन क्षीण हो रहे हैं और पशुओं के रहने-सहने के लिए आवश्यक भूमि घट गई है। यदि इसी गति से गिरावट जारी रही तो ऊंटों का कच्छ के परिदृश्य से पूरी तरह विलोपन संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता है। स्थानीय परंपरा और जैव विविधता को बचाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर ध्यान देना होगा। कच्छ के सांस्कृतिक और पारिस्थितिक मूल्य को देखते हुए इन पशुओं के संरक्षण के लिए व्यापक नीति बनाने की जरूरत है।