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उरुग्वे में वनरोपण से नदियों का जलस्तर घटा, 20 साल का अध्ययन

उरुग्वे ने घास के मैदानों में बड़े पैमाने पर वनरोपण किया, लेकिन दो दशक बाद क्षेत्र की नदियों में पानी की मात्रा में उल्लेखनीय कमी देखी गई। पर्यावरणविदों का मानना है कि पेड़ों की अधिक पानी खपत इस समस्या का मुख्य कारण है।

LSN India · 7 September 2026

उरुग्वे में वनरोपण से नदियों का जलस्तर घटा, 20 साल का अध्ययन

उरुग्वे की सरकार द्वारा संचालित एक दीर्घकालीन वनरोपण परियोजना के अप्रत्याशित परिणाम सामने आए हैं। 1990 के दशक से शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य घास के विशाल मैदानों में वनक्षेत्र बढ़ाना था, जिससे पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों को बढ़ावा मिले। हालांकि, 20 साल के आंकड़ों से पता चला है कि यह कदम जलसंसाधनों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।

अनुसंधानकर्ताओं द्वारा की गई जांच में पाया गया कि रोपे गए वृक्षों की प्रजातियां, विशेषकर यूकेलिप्टस और पाइन, बहुत अधिक मात्रा में भूजल और सतही जल का उपयोग करती हैं। ये पेड़ें प्राकृतिक घास के मैदान की तुलना में कहीं अधिक पानी सोखते हैं, जिससे नदियों और स्रोतों का प्रवाह गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।

उरुग्वे के कई क्षेत्रों में नदियों के जलस्तर में औसतन 30 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है। यह स्थिति स्थानीय समुदायों के लिए चिंता का विषय बन गई है, विशेषकर कृषि और पशुपालन पर निर्भर क्षेत्रों में जहां पानी की उपलब्धता सीमित होती जा रही है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि पर्यावरणीय परियोजनाओं की योजना बनाते समय दीर्घकालीन जलसंसाधन प्रभावों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक है। यह मामला विकासशील देशों के लिए एक महत्वपूर्ण सबक प्रस्तुत करता है कि कैसे एक सकारात्मक पर्यावरणीय कदम अनपेक्षित परिणाम दे सकता है।