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लवासा ने चुनाव आयोग के निर्णय को कानूनी लेकिन अन्यायपूर्ण बताया
भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने सरकारी तंत्र के व्यक्तिगतकरण और संघवाद को खतरे में डालने वाली प्रवृत्ति को लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बताया है। उन्होंने सार्वजनिक अधिकारियों से लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने की अपील की।
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पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने राज्य तंत्र के बढ़ते व्यक्तिगतकरण को भारतीय लोकतंत्र के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती करार दिया है। लवासा ने कहा कि यद्यपि चुनाव आयोग के कुछ निर्णय कानूनी रूप से सही हो सकते हैं, पर उनके क्रियान्वयन में न्याय और नैतिकता का पक्ष नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने संघीय ढांचे के प्रति बढ़ती उदासीनता पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
लवासा ने भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'शक्ति ही सत्य है' की मानसिकता के प्रसार को रेखांकित किया। उनके अनुसार, सार्वजनिक पदों पर कार्यरत अधिकारियों को संवैधानिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वार्थों के बीच संतुलन बनाना चाहिए। पूर्व चुनाव आयुक्त ने सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की अनिवार्यता पर जोर दिया।
लवासा ने राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकारियों से लोकतांत्रिक संस्थाओं के महत्व को समझने का आह्वान किया। उन्होंने माना कि कानूनी औपचारिकताओं के बावजूद, नैतिक और न्यायसंगत कार्रवाई की भावना को बनाए रखना जरूरी है। संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण के लिए समस्त सार्वजनिक अधिकारियों से सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की अपेक्षा की गई है।