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मुस्लिम कानून में अनाथ पोतियों-पोतों के अधिकार की मांग
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कानून आयोग से अपील की है कि वह संसद में विधेयक लाने की सिफारिश करे। इसका उद्देश्य 1937 के कानून में संशोधन करके यह सुनिश्चित करना है कि यदि माता-पिता दादा-दादी से पहले मर जाएं तो पोते-पोतियों को उनका उचित हिस्सा मिले।
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मुस्लिम विरासत कानून में संशोधन की मांग को लेकर कानूनी क्षेत्र में चिंता व्यक्त की जा रही है। एक प्रमुख कानूनविद ने कहा है कि वर्तमान व्यवस्था में अनाथ पोते-पोतियों की स्थिति असुरक्षित रह जाती है। उन्होंने संघीय कानून और न्याय मंत्रालय से इस दिशा में तत्काल कदम उठाने की अपील की है।
मौजूदा मुस्लिम व्यक्तिगत कानून, 1937 के तहत जब कोई दादा-दादी की संपत्ति का विभाजन होता है तो उस समय यदि उनके माता-पिता जीवित नहीं रहते हैं तो पोते-पोतियों का अधिकार स्पष्ट नहीं माना जाता। कानूनविद का मानना है कि इस खामी से पारिवारिक विवादों में वृद्धि हो रही है और बच्चों के हित प्रभावित हो रहे हैं।
प्रस्तावित संशोधन के तहत यदि कोई माता-पिता दादा-दादी से पहले चल बसते हैं तो उनकी संतान को वह हिस्सा मिलना चाहिए जो उनके माता-पिता को मिलता। इससे पारिवारिक संपत्ति का वितरण अधिक न्यायसंगत और पारदर्शी हो सकेगा। कानून आयोग से अपेक्षा की जा रही है कि वह इस मुद्दे पर विस्तृत विचार करते हुए संसद के लिए उपयुक्त विधायी सुझाव प्रस्तुत करे।
इस प्रस्ताव का उद्देश्य मुस्लिम समुदाय के कानूनी संरक्षण को मजबूत करना और अनाथ बच्चों की वंचित स्थिति से निपटना है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का संशोधन भारतीय संविधान की समानता और न्याय की भावना के अनुरूप होगा।