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पटाखों की कानूनी सीमा 125 डेसिबल, कानों के लिए कितना शोर खतरनाक है?
भारत में पटाखों के लिए निर्धारित कानूनी शोर की सीमा 125 डेसिबल तक है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इससे अधिक शोर मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
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भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा तय किए गए नियमों के अनुसार, पटाखों से निकलने वाले शोर की सीमा 125 डेसिबल निर्धारित की गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्तर भी मानव कानों के लिए संभावित रूप से हानिकारक है। साधारण बातचीत लगभग 60 डेसिबल होती है, जबकि ट्रैफिक का शोर 80 डेसिबल तक पहुंचता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, 85 डेसिबल से अधिक का लगातार संपर्क श्रवण शक्ति को नुकसान पहुंचा सकता है। 125 डेसिबल के शोर स्तर पर, विशेषकर बच्चों और संवेदनशील लोगों में, तुरंत श्रवण क्षति होने का जोखिम रहता है। दीपावली और अन्य त्योहारों के दौरान इस तरह के उच्च शोर स्तर से अस्थायी या स्थायी सुनने की समस्या हो सकती है।
श्रवण हानि के अलावा, अत्यधिक शोर से नींद में बाधा, तनाव, चिड़चिड़ापन और हृदय संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पटाखों के दौरान कानों की सुरक्षा के लिए ईयरप्लग या ईयरमफ का उपयोग किया जाए। बुजुर्गों, बच्चों और पालतू जानवरों को विशेष सावधानी की आवश्यकता है क्योंकि उनकी श्रवण संवेदनशीलता अधिक होती है।
स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विभाग पटाखों के शोर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जागरूकता अभियान चलाते हैं। पर्यावरण संरक्षण नियमों के तहत कई क्षेत्रों में निर्धारित समय के दौरान ही पटाखे फोड़ने की अनुमति दी जाती है, जिससे शोर प्रदूषण को कम किया जा सके।