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मदनापल्ली के बुनकर अपनी परंपरागत कला को बचाने के लिए संघर्षरत

हथकरघा और रेशम साड़ियों के लिए प्रसिद्ध मदनापल्ली में बुनाई की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, लेकिन आर्थिक संकट और शक्तिशाली करघों की प्रतिद्वंद्विता इस विरासत को खतरे में डाल रही है।

LSN India · 5 September 2026

मदनापल्ली के बुनकर अपनी परंपरागत कला को बचाने के लिए संघर्षरत

आंध्र प्रदेश के मदनापल्ली शहर में हथकरघा बुनकरों का पारंपरिक समुदाय एक कठिन दौर से गुजर रहा है। जहां पहले बुनाई को जीविका का एक सम्मानित साधन माना जाता था, वहीं आज घटते आय, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और बाजार में बिजली चालित करघों की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के कारण यह परंपरागत कला संकट में है।

इस हथकरघा केंद्र की मशहूरी रेशम साड़ियां और बुनी हुई वस्तुएं दशकों से भारत की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक रही हैं। स्थानीय कारीगर परिवारों के लिए यह केवल व्यवसाय नहीं बल्कि अपनी पहचान और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। हालांकि, बाजार में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और सस्ते विकल्पों के आगमन ने हाथ से बने सामानों की मांग को प्रभावित किया है।

इसके अलावा, युवा पीढ़ी को यह कला विरासत में देना भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। लंबे काम के घंटे, कम आय और आधुनिक रोजगार के विकल्प युवाओं को इस परंपरागत पेशे से दूर ले जा रहे हैं। कई बुनकर परिवार अपने बच्चों को शिक्षा के माध्यम से अन्य क्षेत्रों में भेज रहे हैं, जिससे इस कला का ज्ञान और अनुभव आगे की पीढ़ी तक नहीं पहुंच पा रहा है।

मदनापल्ली के बुनकरों का यह संघर्ष केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर को बचाए रखने का भी है। सरकारी सहायता, बेहतर बाजार पहुंच और युवाओं को प्रशिक्षण देने की पहल से ही इस पारंपरिक कला को जीवंत रखा जा सकता है।