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मद्रास उच्च न्यायालय वकील संगठन ने 1965 के अंग्रेजी निर्णय को चुनौती दी
मद्रास हाई कोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन ने सर्वोच्च न्यायालय और सभी उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी को आम भाषा बनाने के 1965 के यूनियन कैबिनेट निर्णय को चुनौती दी है। यह निर्णय सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्त करने के बाद ही 2025 में सामने आया है।
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मद्रास उच्च न्यायालय वकील संगठन ने देश के न्यायिक तंत्र में अंग्रेजी भाषा की स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण चुनौती उठाई है। संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय और सभी उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी को सामान्य भाषा के रूप में जारी रखने के संबंध में 1965 का यूनियन कैबिनेट निर्णय को प्रश्नचिह्न लगाया है।
यह मुद्दा तब सार्वजनिक हुआ जब एक वकील ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत संबंधित दस्तावेज मांगे और वह ऐतिहासिक निर्णय के विवरण प्राप्त किए। तकनीकी रूप से छह दशक पहले लिया गया यह निर्णय वर्षों तक सार्वजनिक ध्यान में नहीं आया।
वकील संगठन के इस कदम से भारतीय न्यायपालिका में राजभाषा की भूमिका और भारतीय भाषाओं के उपयोग को लेकर व्यापक बहस शुरू होने की संभावना है। संगठन का तर्क है कि न्यायिक प्रणाली को आम नागरिकों के लिए अधिक सुलभ और समझदारी में आसान होना चाहिए।
इस विवाद से यह सवाल भी उठता है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348 में निहित हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रावधानों को कैसे बेहतर तरीके से लागू किया जा सकता है। न्यायिक सुधार की मांग करने वाले विभिन्न समूहों को इस पहल से आशा मिली है कि भारतीय भाषाओं को न्यायिक व्यवस्था में अधिक प्रमुख स्थान मिल सकता है।