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विदेश मंत्रालय को बजट में कम हिस्सा, वैश्विक चुनौतियां बढ़ रहीं
विदेश मंत्रालय का बजटीय आवंटन पिछले एक दशक में लगभग 50 प्रतिशत बढ़ा है, लेकिन संघीय बजट में इसका अनुपात घट रहा है। यह समय में आया है जब विश्व में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ रही है।
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भारत के विदेश मंत्रालय को वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद संघीय बजट में अपनी हिस्सेदारी घटानी पड़ रही है। पिछले दस वर्षों में विदेश मंत्रालय का वास्तविक आवंटन लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ा है, लेकिन कुल केंद्रीय बजट में इसकी भागीदारी में गिरावट देखी जा रही है। यह प्रवृत्ति उस समय सामने आ रही है जब अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में तनाव और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
विदेश नीति के क्षेत्र में काम करने वाले विश्लेषकों का कहना है कि सीमित बजट के साथ विदेश मंत्रालय को अपनी कूटनीतिक और राजनयिक गतिविधियों में समन्वय स्थापित करना होगा। भारत के पड़ोसी क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव और बहुपक्षीय संबंधों को संभालने में विदेश मंत्रालय की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। अलबत्ता, बजटीय सीमाओं का मतलब है कि प्रत्येक रुपये का बेहतर उपयोग करना होगा।
भारत की विदेश नीति की प्रभावशीलता बजट आवंटन पर निर्भर करती है। नई दिल्ली को दक्षिण एशिया से लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक विस्तृत हितों की रक्षा करनी है। ऐसे में विदेश मंत्रालय के संसाधनों में कमी दीर्घकालीन चुनौती बन सकती है, भले ही वर्तमान में आवंटित राशि पूर्ववर्ती वर्षों की तुलना में अधिक है।