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मध्यकालीन भारत में मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, आर्थिक केंद्र भी थे
एनसीईआरटी के अध्ययन के अनुसार, 1000 से 1700 ईस्वी तक के काल में भारतीय मंदिर आर्थिक संस्थानों के रूप में कार्य करते थे। ये राजनीतिक सत्ता को वैधता भी प्रदान करते थे।
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राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नई व्याख्या के अनुसार, मध्यकालीन भारत में मंदिरों की भूमिका केवल धार्मिक केंद्रों तक सीमित नहीं थी। 1000 से 1700 ईस्वी के बीच के एक हजार वर्षों में, ये संस्थान अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण आर्थिक भूमिका निभाते थे।
एनसीईआरटी के अनुसार, मंदिर तत्कालीन समाज में बहुआयामी संस्थान थे। ये न केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक थे, बल्कि भूमि, धन और संपत्ति का प्रबंधन भी करते थे। मंदिरों के पास विशाल भू-संपत्ति होती थी, और वे कृषि उत्पादन में सक्रिय भूमिका रखते थे। इनकी आय के स्रोतों में दान, व्यापार, और विभिन्न कर शामिल थे।
राजनीतिक सत्ता को वैधता प्रदान करने में भी मंदिरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। राजा और शासक अपनी सत्ता की न्यायसंगतता धार्मिक मान्यता के माध्यम से प्रतिष्ठित करते थे। बड़े मंदिरों को दान देना और उनके निर्माण में योगदान राजनीतिक शक्ति और वैधता का प्रदर्शन था। इससे शासकों की जनता में धार्मिक और सांस्कृतिक स्वीकृति बढ़ती थी।
एनसीईआरटी की यह व्याख्या मध्यकालीन भारतीय समाज की जटिल संरचना को समझने का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रस्तुत करती है। इससे स्पष्ट होता है कि मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं थे, बल्कि तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के अभिन्न अंग थे।