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मैसूर दशहरे में हाथी ले जाएगा पारंपरिक हौदा, राजकीय परंपरा बरकरार
1969 के बाद से राजा नहीं बैठते, लेकिन मैसूर के दशहरे में हाथियों के सिर पर हौदा ले जाने की परंपरा आज भी जारी है। इस बार भी एक नए हाथी को यह दायित्व सौंपा गया है।
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मैसूर के प्रसिद्ध दशहरे समारोह में सदियों से चली आ रही परंपरा को जारी रखते हुए इस वर्ष एक हाथी को पारंपरिक हौदा ले जाने का काम सौंपा गया है। भारतीय राजकीय परंपरा का यह अभिन्न अंग आज भी मैसूर के सांस्कृतिक एवं धार्मिक समारोहों की रीढ़ बना हुआ है।
हौदे को ढोने की यह परंपरा कई दशक पुरानी है और मैसूर की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। वर्ष 1969 के बाद से राजा-महाराजा अपने राज्य की परेड में हाथी पर सवार होना बंद कर चुके हैं, लेकिन दशहरे की भव्य जुलूस में हाथी अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाए रखे हुए हैं।
मैसूर नगरपालिका और स्थानीय अधिकारी इस परंपरा को संरक्षित रखने के लिए प्रतिवर्ष हाथियों के चयन, प्रशिक्षण और देखभाल पर विशेष ध्यान देते हैं। दशहरे के दौरान हाथियों का यह भव्य जुलूस शहर की आस्था और परंपरा का प्रतीक माना जाता है।
मैसूर का दशहरा भारत के सबसे महत्वपूर्ण और भव्य सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है, जिसे लाखों श्रद्धालु और पर्यटक देखने आते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को बनाए रखना मैसूर की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रखने का एक तरीका माना जाता है।