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प्राकृतिक संपदा का हिसाब-किताब नीति निर्धारण को मजबूत करेगा
पर्यावरणीय लेखांकन प्रणाली सरकारों को बेहतर नीति निर्णय लेने में मदद दे सकती है। जल, वन और खनिज जैसी प्राकृतिक संपदा का सही मूल्यांकन आर्थिक विकास को टिकाऊ बनाने की कुंजी है।
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देशों की आर्थिक प्रगति का आकलन करने के लिए परंपरागत तरीकों में प्राकृतिक संसाधनों का क्षय और उनके नुकसान को नजरअंदाज किया जाता है। पर्यावरणीय लेखांकन इसी खामी को दूर करता है और एक व्यापक चित्र प्रस्तुत करता है कि किस तरह राष्ट्रीय संपत्ति का उपयोग हो रहा है।
यह प्रणाली वनों की कटाई, भूजल का अतिदोहन, मिट्टी का क्षरण और खनिज संसाधनों के दोहन को आर्थिक मूल्य में रूपांतरित करती है। इससे नीति निर्माताओं को पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के बीच वास्तविक संबंध समझने में मदद मिलती है।
प्राकृतिक संपदा का सटीक लेखा-जोखा लंबे समय तक टिकाऊ विकास सुनिश्चित करता है। यह दृष्टिकोण सरकारों को ऐसी नीतियां बनाने के लिए प्रेरित करता है जो वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों दोनों के हितों की रक्षा करें।
भारत जैसे देशों के लिए, जहां कृषि और प्राकृतिक संसाधन आय का प्रमुख स्रोत हैं, पर्यावरणीय लेखांकन विशेष महत्व रखता है। इसके माध्यम से सरकार विकास परियोजनाओं के सच्चे प्रभाव को समझ सकती है और संसाधनों का बेहतर प्रबंधन कर सकती है।