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नेतन्याहू को बहुमत नहीं, इजरायल की राजनीति में उथल-पुथल
इजरायली चुनावों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को संसद में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, जिससे देश की राजनीति अनिश्चितता के दौर में प्रवेश कर गई है। इस स्थिति के भारत के हितों पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकते हैं।
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इजरायल के संसदीय चुनावों के परिणाम घोषित होने के बाद राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। नेतन्याहू के नेतृत्व वाली लिकुद पार्टी को हालांकि सर्वाधिक सीटें मिली हैं, लेकिन कुल 120 सदस्यीय संसद में 61 सीटों के बहुमत के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उन्हें गठबंधन के लिए अन्य पार्टियों पर निर्भर रहना होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, नेतन्याहू के पास सरकार बनाने के लिए कुछ विकल्प हैं। वे दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के साथ गठबंधन करके बहुमत हासिल कर सकते हैं। हालांकि, ये वार्ताएं समय लेने वाली हो सकती हैं और इसमें कई राजनीतिक समझौते करने पड़ सकते हैं।
भारत के परिप्रेक्ष्य से यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और इजरायल के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी और कृषि क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं। एक स्थिर इजरायली सरकार का गठन भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। मध्य पूर्व की राजनीतिक स्थिरता भारत के सामरिक हितों को प्रभावित करती है।
नई सरकार के गठन में कुछ सप्ताह लग सकते हैं, जिस दौरान इजरायली राजनीति में पर्दे के पीछे गहन वार्ताएं चलेंगी। भारत इस प्रक्रिया को ध्यान से देख रहा है ताकि अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत रखने के लिए नई सरकार के साथ तालमेल बिठा सके।