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यमन संकट में पाकिस्तान की भूमिका: सऊदी सहयोग में नई चुनौती
हूती ड्रोन और मिसाइल हमलों के बीच मक्का रक्षा समझौता सक्रिय होने से पाकिस्तान और तुर्की को सऊदी अरब की सैन्य सहायता के लिए तैयार रहना पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यमन की भौगोलिक चुनौतियां और हूतियों की मजबूत जमीनी उपस्थिति इस कार्य को अत्यंत कठिन बना देती है।
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यमन में बढ़ते हूती ड्रोन और मिसाइल हमलों के मद्देनजर मक्का रक्षा समझौता सक्रिय हो गया है, जिसके तहत सदस्य देशों को सऊदी अरब की सैन्य सहायता प्रदान करनी होगी। इस समझौते के अंतर्गत पाकिस्तान और तुर्की को भी क्षेत्रीय सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ सकती है। यह कदम विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हूती गोलीबारी लाल सागर व्यापार मार्गों को खतरे में डाल रही है।
हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सैन्य हस्तक्षेप अकेले इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। यमन के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में हूतियों की गहरी जमीनी पकड़ और स्थानीय समर्थन उन्हें एक जटिल प्रतिद्वंद्वी बनाता है। 2015 में पाकिस्तान अपनी सैन्य भागीदारी से पीछे हट गया था, जिससे वर्तमान परिस्थिति में उसकी भूमिका और जटिल हो जाती है।
विश्लेषकों के अनुसार, यमन में 2015 के बाद से चली आ रही लड़ाई यह साबित कर चुकी है कि सामरिक सहायता और वायु शक्ति के बिना जमीनी राजनीति को बदला नहीं जा सकता। हूती संगठन की जड़ें समाज में गहरी हैं और वह स्थानीय जनसमर्थन पर निर्भर है। इसलिए किसी भी सैन्य समाधान के साथ राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयास भी जरूरी हैं।