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यमन संकट में पाकिस्तान की संभावित भूमिका से सुरक्षा चुनौतियां बढ़ीं
हूती मिसाइल हमलों के बीच सऊदी अरब को सैन्य सहायता देने के लिए पाकिस्तान की संभावित भागीदारी एक जटिल स्थिति पैदा कर रही है। यह विकास 1960 के दशक में मिस्र की यमन में की गई सैन्य कार्रवाइयों की याद दिलाते हुए इस्लामाबाद के शीर्ष सैन्य नेतृत्व के लिए गंभीर जोखिम पेश करता है।
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हूती गुट द्वारा सऊदी अरब पर किए जा रहे हमलों में इजाफा होने के साथ ही पाकिस्तान की संभावित सैन्य भूमिका का सवाल उठने लगा है। खबरें सामने आ रही हैं कि पाकिस्तान सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन को सेना भेजने के संदर्भ में गहन विचार-विमर्श कर रहा है, जिससे इस क्षेत्र में नई जटिलताएं आ सकती हैं।
पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के सामने यह निर्णय एक कठिन परिस्थिति लेकर आया है। यमन में सीधी सैन्य भागीदारी का मतलब गहरे भू-राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं और देश को क्षेत्रीय द्वंद्वों के केंद्र में ला सकते हैं।
इतिहास के पन्नों को देखें तो 1960 के दशक में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने यमन में एक विनाशकारी सैन्य हस्तक्षेप किया था जो उनके लिए रणनीतिक नुकसान साबित हुआ था। पाकिस्तान के नीति निर्माता इस ऐतिहासिक उदाहरण से सीख लेने के लिए बाध्य हैं।
वर्तमान परिस्थिति में पाकिस्तान की सऊदी सहायता से न केवल हूती तनाव बढ़ सकता है, बल्कि देश के आंतरिक सुरक्षा को भी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। इस परिदृश्य में सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के लिए स्थितियों का गहन मूल्यांकन आवश्यक है।