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सऊदी रक्षा के वादों में पाकिस्तान की खामियां, हूती खतरा बरकरार
पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी के बावजूद हूती हमलों के विरुद्ध प्रभावी सैन्य सहायता प्रदान करने में विफल रहा है। 2015 से लेकर वर्तमान तक, इस्लामाबाद की भूमिका मुख्यतः मौखिक समर्थन तक सीमित बनी है।
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पाकिस्तान ने बार-बार सऊदी अरब की सुरक्षा में अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, किंतु यमन से संचालित हूती गुटों की ओर से बढ़ते खतरों का मुकाबला करने में व्यावहारिक स्तर पर उसकी भूमिका सीमित ही रही है। पिछले दशक भर में रियाद पर लगातार किए गए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बीच इस्लामाबाद की सैन्य और तकनीकी सहायता अपेक्षा से कम ठहरी है।
पाकिस्तानी नेतृत्व, जिसमें प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल मुनीर अख्तर शामिल हैं, ने सऊदी अरब के साथ एकता का संदेश देते हुए कई बयान जारी किए हैं। तथापि, इन राजनीतिक और कूटनीतिक घोषणाओं के विपरीत, इस्लामाबाद की ठोस सैन्य भागीदारी में कमी देखी गई है।
हूती गुट द्वारा किए जा रहे हमले सऊदी अरब की आर्थिक और सुरक्षा अवसंरचना के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बने हुए हैं। विशेषज्ञ इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पाकिस्तान की सीमित सैन्य भूमिका, आंतरिक राजनीतिक और वित्तीय बाधाओं के साथ-साथ यमन में जटिल संघर्ष की गतिविधियों से जुड़ी है।
इस स्थिति के बीच सऊदी नेतृत्व के लिए यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या इस्लामाबाद अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकता है। हूती खतरे को देखते हुए क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग की मांग लगातार बढ़ रही है।