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संसदीय समिति ने शहरी मानदंडों में लैंगिक समावेशिता की मांग की
संसदीय पैनल ने भारत की शहरीकरण की परंपरागत परिभाषा और अंतरराष्ट्रीय मानकों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर की ओर ध्यान आकर्षित किया है। पैनल ने 3000 जनगणना शहरों में नगर परिषदों की कमी को भी चिन्हित किया है।
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एक संसदीय समिति ने भारत के शहरी विकास के मानदंडों में लैंगिक समावेशिता को शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया है। समिति ने अपने विश्लेषण में पाया कि देश की शहरीकरण की परंपरागत पद्धति और अंतरराष्ट्रीय परिभाषाओं के बीच एक महत्वपूर्ण अंतराल मौजूद है।
समिति का ध्यान एक और महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर गया है कि जनगणना में निर्दिष्ट लगभग 3000 शहरों में नगर परिषदें स्थापित नहीं की गई हैं। यह स्थिति शहरी स्तर पर प्रशासनिक ढांचे में एक स्पष्ट कमी को दर्शाती है।
पैनल का मानना है कि शहरी विकास की नीतियों को तैयार करते समय महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस समावेशी दृष्टिकोण से न केवल शहरी नियोजन में सुधार होगा, बल्कि समाज के सभी वर्गों के लिए समान अवसर भी सुनिश्चित होंगे।
समिति ने सिफारिश की है कि सरकार के संबंधित विभागों को शहरीकरण के मानकों को पुनर्परिभाषित करने और नगर पालिका संरचनाओं को मजबूत करने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए।