World · India Bureau
वन अधिकार कानून कमजोर पड़ रहा है, ग्राम सभा सहमति का नियम टूट रहा
संसदीय समिति ने सभी प्रभावित ग्राम सभाओं की सहमति के बजाय बहुमत की सहमति को पर्याप्त मानने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम वन निवासियों के अधिकारों को और कमजोर करने की प्रवृत्ति का हिस्सा है।
LSN India ·

भारत के वन अधिकार ढांचे को नुकसान पहुंचाने की प्रक्रिया विभिन्न सरकारी मंत्रालयों के स्तर पर जारी है। सार्वजनिक उपक्रम समिति का हालिया प्रस्ताव इसी कमजोरी का सबसे नया उदाहरण है।
समिति ने अनुसंशा की है कि किसी भी परियोजना के लिए प्रभावित सभी ग्राम सभाओं की सर्वसम्मत सहमति की जरूरत नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय ग्राम सभाओं का बहुमत यानी सुपर मेजोरिटी की मंजूरी पर्याप्त माना जाए। यह प्रस्ताव तार्किक प्रतीत हो सकता है, लेकिन यह वास्तव में वन अधिकार कानून की मूल भावना को नष्ट करने का कदम है।
वर्तमान में भारतीय कानून यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी परियोजना से प्रभावित होने वाली सभी ग्राम सभाओं की स्पष्ट सहमति आवश्यक है। इस प्रावधान का उद्देश्य वन निवासियों और जनजातीय समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा करना था। लेकिन विभिन्न स्तरों पर ऐसे प्रस्ताव इस सुरक्षा को क्रमिक रूप से कमजोर कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुपर मेजोरिटी का मानदंड अल्पसंख्यक समुदायों को हाशिए पर ला सकता है। यदि एक ग्राम सभा भी किसी परियोजना का विरोध करे, लेकिन बाकी सभी सहमत हों, तो अल्पसंख्यक का मत नजरअंदाज हो सकता है। यह परिवर्तन वन अधिकार अधिनियम 2006 के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध है।