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वंदे मातरम् को 'विभाजनकारी धार्मिक गीत' बताकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका
एक याचिकाकर्ता ने छह पद वाली वंदे मातरम् को धार्मिक दृष्टि से विभाजनकारी बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की है। याचिका में सरकारी आदेशों को 'थियोक्रेसी' की ओर कदम बताया गया है।
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फुले-अंबेडकरवादी विचारक बी.डी. बोरकर की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि छह पद वाली वंदे मातरम् राष्ट्रगीत के रूप में अनिवार्य किया जाना भारत में साम्प्रदायिक विभाजन को गहरा करेगा। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह कदम अल्पसंख्यक धर्मों की धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है।
याचिका में कहा गया है कि लगातार दो सरकारी आदेशों के माध्यम से राज्य की ओर से दिया जाने वाला यह अनिवार्य निर्देश संविधान के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। बोरकर का तर्क है कि यह व्यवस्था राष्ट्र को धार्मिक राज्य की ओर ले जाने का प्रयास है।
याचिका में उठाए गए मुद्दे भारत में धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान से जुड़े संवेदनशील सवालों को छूते हैं। सामाजिक न्याय के पक्षधर समूहों का तर्क है कि वंदे मातरम् का कुछ हिस्सा ऐतिहासिक रूप से विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच विवाद का कारण रहा है।
यह याचिका न्यायालय के समक्ष एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति अनिवार्य सम्मान धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ कैसे संतुलित किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले पर महत्वपूर्ण निर्णय की प्रत्याशा है।