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NALSA फैसले के बाद बने दस्तावेज नियम महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण: याचिका

एक ब्रिटिश ट्रस्ट की भारतीय शाखा ने सुप्रीम कोर्ट के NALSA फैसले को चुनौती दी है, जिसमें कहा गया है कि लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता संवैधानिक अधिकारों का हिस्सा है।

LSN India · 29 October 2026

NALSA फैसले के बाद बने दस्तावेज नियम महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण: याचिका

दिल्ली में दायर एक जनहित याचिका में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की भारतीय इकाई ने तर्क दिया है कि NALSA निर्णय के बाद तैयार किए गए दस्तावेज़ संशोधन नियम जैविक महिलाओं के खिलाफ गंभीर भेदभाव करते हैं। याचिका में कहा गया है कि ये नियम राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण के फैसले की भावना के विरुद्ध हैं।

वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट का NALSA निर्णय एक महत्वपूर्ण कानूनी घटना थी जिसमें यह घोषणा की गई थी कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा और स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। इस निर्णय को व्यापक रूप से एशिया में ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए एक मील का पत्थर माना गया था।

हालांकि, याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए कार्यान्वयन दिशानिर्देश और नियम इसके मूल उद्देश्य से विचलित हो गए हैं। पीआईएल में यह भी कहा गया है कि इन नियमों ने महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के संदर्भ में नई समस्याएं पैदा की हैं।

यह याचिका न केवल कानूनी दृष्टिकोण से बल्कि सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन के प्रश्न को भी उठाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय न्यायपालिका के लिए एक जटिल चुनौती साबित हो सकता है, क्योंकि इसमें विभिन्न समूहों के अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता है।