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राजनीतिक विभाजन ने दसवीं अनुसूची के विलय नियम पर उठाए सवाल
तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना के विभाजन के बाद विधायकों को अयोग्य ठहराने से बचाने वाले दो-तिहाई विलय अपवाद की वैधता पर नई बहस शुरू हुई है। विशेषज्ञ संख्यात्मक शक्ति को ही एकमात्र मानदंड मानने पर सवाल उठा रहे हैं।
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भारतीय राजनीति में हाल की पार्टी विभाजन की घटनाओं ने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों के अयोग्यता संबंधी कानून पर पुनः चर्चा को जन्म दिया है। तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना के भीतर हुए राजनीतिक बदलाव ने इस महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान की कार्यप्रणाली की जांच के लिए मजबूर किया है।
दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दो-तिहाई विलय अपवाद यह सुनिश्चित करता है कि यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई विधायक दूसरी पार्टी में विलय के लिए सहमत हों तो शेष विधायकों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। यह प्रावधान राजनीतिक लचीलेपन की अनुमति देता है, किंतु हाल की घटनाओं ने इस नियम के दुरुपयोग की संभावना को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
विधि विशेषज्ञ और राजनीति विश्लेषक अब इस बात पर केंद्रित हैं कि क्या संख्यात्मक शक्ति अकेली ही विधायकों के अयोग्यता से बचाव का आधार हो सकती है। उनके अनुसार, पार्टी के मूल सिद्धांत और विचारधारा को भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए। ये मुद्दे भारतीय संसदीय प्रणाली की अखंडता और राजनीतिक निष्ठा के सवालों को केंद्र में रखते हैं।
इस बहस के माध्यम से संविधान संशोधन और न्यायिक पुनर्विचार की मांग तेज होने की संभावना है, जिससे दलबदलू विरोधी कानून को और अधिक कठोर बनाया जा सके।