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गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को कार्यस्थल पर भेदभाव का सामना

कानूनी सुरक्षा के बावजूद भारत में हजारों महिलाएं गर्भावस्था और प्रसव के बाद कार्यस्थल पर भेदभाव का शिकार होती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन की तत्काल आवश्यकता है।

LSN India · 18 September 2026

भारत में गर्भवती कर्मचारियों और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय कानून मौजूद हैं, लेकिन व्यवहार में लाखों महिलाएं भेदभाव का सामना करती हैं। इन महिलाओं को नौकरी से निकाले जाने, वेतन में कटौती, पदावनति या काम से वंचित किए जाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

श्रम कानूनों के तहत गर्भवती महिलाओं को मातृत्व लाभ, प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर अवकाश तथा अन्य सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। हालांकि, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं सहित कई कर्मचारियों को ये अधिकार नहीं मिल पाते। प्राइवेट कंपनियों में भी अक्सर इन कानूनों का उल्लंघन देखा जाता है।

श्रम विभाग के अधिकारियों के अनुसार, कई महिलाएं भेदभाव की शिकायत दर्ज नहीं करती क्योंकि उन्हें नौकरी खोने का भय होता है। साथ ही, शिकायत प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली है। समाज के सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन और नियोक्ताओं द्वारा कानूनी जिम्मेदारियों की समझ भी इस समस्या के समाधान के लिए महत्वपूर्ण है।

श्रम संगठन और महिला अधिकार समूह इस मुद्दे को गंभीरता से लेने और कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन तथा जागरूकता कार्यक्रमों की वकालत कर रहे हैं। वे नियोक्ताओं को गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं की विशेष आवश्यकताओं को समझने और उनके अधिकारों का सम्मान करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।