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मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए रेपो दर बढ़ोतरी, मध्यमवर्गीय परिवारों पर दबाव
रिजर्व बैंक ने साढ़े तीन साल के अंतराल के बाद रेपो रेट में वृद्धि की है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और महंगाई को नियंत्रित करने के इस कदम से होम लोन की ईएमआई बढ़ने का संकट खड़ा हो गया है।
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मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने रेपो रेट में बढ़ोतरी की घोषणा की है। यह निर्णय तीन साल से अधिक समय के बाद लिया गया है, जब अर्थव्यवस्था कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और तेजी से बढ़ती महंगाई की चपेट में आ गई है।
मौद्रिक नीति में यह परिवर्तन केंद्रीय बैंक और सरकार की कीमत नियंत्रण की रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, इस कदम के भीतरी आर्थिक परिणाम मिश्रित हैं। एक ओर तो यह महंगाई को नियंत्रित करने में मददगार साबित हो सकता है, दूसरी ओर आम नागरिकों के लिए यह समस्या का कारण बन रहा है।
रेपो रेट की बढ़ोतरी का सबसे सीधा असर गृह ऋणों पर पड़ता है। बैंकों द्वारा रेपो दर के आधार पर निर्धारित ब्याज दरें बढ़ जाने से होम लोन की मासिक किस्तें (ईएमआई) में इजाफा हो जाता है। इससे ऐसे परिवार प्रभावित होते हैं जिन्होंने आवास खरीद के लिए ऋण लिया है।
मध्यमवर्गीय परिवार इस नीतिगत बदलाव की सबसे अधिक मार झेल रहे हैं। बढ़ती ईएमआई के साथ-साथ खाद्य सामग्री, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी ऊपर जा रही हैं, जिससे उनका मासिक बजट और कठिन हो गया है। ऐसे में आम आदमी के लिए अपनी दैनंदिन जरूरतों को पूरा करना और कर्ज की किस्तें चुकाना दोनों ही चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।