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दलित-आदिवासी संगठनों ने कर्नाटक हाईकोर्ट के आरक्षण फैसले की निंदा की
कर्नाटक में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समुदायों के प्रतिनिधि संगठनों ने राज्य के हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ तीव्र असंतोष जताया है जिसने बढ़े हुए आरक्षण को खारिज कर दिया है।
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कर्नाटक हाईकोर्ट के द्वारा दिए गए फैसले ने दलित और आदिवासी समुदायों के बीच व्यापक निराशा का माहौल पैदा कर दिया है। इस फैसले में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए दिए गए बढ़े हुए आरक्षण को रद्द कर दिया गया है। राज्य भर में इन समुदायों के संगठन और प्रतिनिधि इस फैसले को समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताते हुए इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं।
दलित और आदिवासी नेताओं का मानना है कि यह निर्णय लंबे समय से चली आ रही ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने के प्रयासों में बाधा डालता है। उनके अनुसार, बढ़ा हुआ आरक्षण इन हाशिए पर रहे समुदायों को शिक्षा और रोजगार में समान अवसर प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन था।
विभिन्न सामाजिक संगठन इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाते हुए कानूनी चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। वे इस मामले को उच्चतर न्यायालय तक ले जाने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं ताकि दलित और आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा की जा सके।
इस निर्णय ने कर्नाटक में सामाजिक न्याय और आरक्षण नीति को लेकर एक बार फिर से तीव्र बहस को जन्म दिया है। प्रभावित समुदायों का कहना है कि सरकार को संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत दिए गए अधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए।