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अनुसूचित जाति का दर्जा एक राज्य तक सीमित, दूसरे राज्य में मान्य नहीं
ओड़िशा उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी एक राज्य में अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता प्राप्त जाति के सदस्य को दूसरे राज्य में स्वतः ही वही दर्जा या अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिलेगा।
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ओड़िशा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा राज्य-विशिष्ट होता है। किसी एक राज्य में अनुसूचित जाति के रूप में सूचीबद्ध जाति के सदस्य को दूसरे राज्य में स्वतः ही समान मान्यता नहीं दी जा सकती।
न्यायालय के अनुसार, भारतीय संविधान के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग तैयार की जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि किसी विशेष जाति का दर्जा एक राज्य में मान्य हो सकता है, लेकिन दूसरे राज्य में उसे वही सुविधाएं और आरक्षण के लाभ स्वतः प्राप्त नहीं होंगे।
यह निर्णय उन व्यक्तियों के मामलों में महत्वपूर्ण है जो एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी को नए राज्य में अपनी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के लिए औपचारिक पुष्टि प्राप्त करनी होगी।
न्यायालय का यह फैसला केंद्रीय नीति के अनुरूप है, जिसमें आरक्षण के लाभ राज्य-स्तरीय सूचियों पर आधारित होते हैं। इससे संबंधित किसी भी विवाद का समाधान करने के लिए व्यक्तियों को संबंधित राज्य के प्रशासनिक निकायों से संपर्क करना होगा।