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हाथियों के आवास को व्यवस्थित रूप से नष्ट किया जा रहा है: रमेश
सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि राज्य फसलों और आजीविका की सुरक्षा के नाम पर हाथियों के मार्ग में बाधाएं नहीं लगा सकते। न्यायाधीशों ने संरक्षण के प्रति सरकारों की कमजोर इच्छा शक्ति पर चिंता व्यक्त की।
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सर्वोच्च न्यायालय की एक तीन सदस्यीय खंडपीठ ने मंगलवार को कहा कि देश में हाथियों के प्राकृतिक आवास और गलियारों को व्यवस्थित तरीके से नष्ट किया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने कहा कि इस स्थिति में सरकारों की ओर से संरक्षण के प्रति वास्तविक इच्छा शक्ति का अभाव दिखाई दे रहा है।
न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए कि कोई भी राज्य अपनी फसलों और आजीविका की सुरक्षा के नाम पर हाथियों के प्रवास मार्गों में बाधाएं नहीं लगा सकता है। खंडपीठ का मानना है कि ऐसी कार्रवाइयां न केवल वन्यजीवों के अधिकारों का उल्लंघन करती हैं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन को भी गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं।
यह निर्णय मानव-वन्यजीव संघर्ष के बढ़ते प्रकरणों के बीच आया है, जहां हाथियों की आवाजाही से कृषि क्षेत्रों को नुकसान होता है। अदालत ने राज्य सरकारों से कहा कि उन्हें हाथियों के संरक्षण के लिए वैकल्पिक उपायों की खोज करनी चाहिए, न कि उनके प्राकृतिक मार्गों को अवरुद्ध करना चाहिए।