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मजबूत एल नीनो भी भारतीय मानसून को कमजोर करने की गारंटी नहीं देता
1950 के बाद से भारत में सात मानसूनों को मध्यम या तीव्र एल नीनो का सामना करना पड़ा। इनमें से पांच वर्षों में, जिनमें 2026 भी शामिल है, मानसून की वर्षा दीर्घकालीन औसत से कम से कम 10 प्रतिशत कम रही।
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भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) द्वारा इस स्तर को 'न्यून' (डिफिशिएंट) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। हालांकि, एल नीनो की घटना का मानसून पर हमेशा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।
पिछले सात दशकों में जब एल नीनो की स्थिति रहई है, तब भारतीय मानसून के प्रदर्शन में काफी भिन्नता देखी गई है। आईएमडी के विश्लेषण के अनुसार, इन सात मानसूनों में से पांच में वर्षा की कमी दर्ज की गई, जबकि 2023 का मौसम अपेक्षाकृत अलग रहा जहां वर्षा 'औसत से नीचे' (बिलो एवरेज) श्रेणी में आई।
1997 का मानसून अपने आप में एक अपवाद साबित हुआ, जब एल नीनो की मजबूत स्थिति के बावजूद वर्षा का स्तर औसत रहा। यह तथ्य इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक जलवायु पैटर्न के अलावा भी कई अन्य कारक भारतीय मानसून को प्रभावित करते हैं।
भारतीय कृषि और आर्थिक नियोजन के लिए मानसून की भविष्यवाणी अत्यंत महत्वपूर्ण है। एल नीनो जैसी घटनाओं के बारे में जानकारी महत्वपूर्ण होती है, लेकिन इसे अकेले पूर्ण संकेतक नहीं माना जा सकता।