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सुभाष चंद्रा के सौदे में उजागर हुई IBC की कमजोरियां
NCLT ने सुभाष चंद्रा से जुड़ी पांच कंपनियों को कानूनी रूप से 'सहयोगी' नहीं माना, जिससे उन्हें एक योजना के लिए वोट देने का अधिकार मिल गया। यह मामला दिवालियापन कानून की व्याख्या में अंतराल को उजागर करता है।
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राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLT) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सुभाष चंद्रा से जुड़ी पांच इकाइयों को 'सहयोगी' की परिभाषा में नहीं रखा है। इस फैसले के कारण 6.5 करोड़ रुपये के एक सौदे में ये इकाइयां एक पुनर्निर्माण योजना के लिए मतदान कर सकीं। यह मामला भारतीय दिवालियापन और दिवाड़िया संहिता (IBC) की 'सहयोगी परीक्षण' की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण अंतराल को सामने लाता है।
IBC के तहत 'सहयोगी' की परिभाषा बेहद संकीर्ण तरीके से की जा सकती है, जैसा इस मामले में देखा गया है। न्यायाधिकरण के निर्णय से पता चलता है कि किस तरह कानूनी संबंधों की तकनीकी व्याख्या से दिवालिया प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हितधारकों को बाहर रखा जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्याख्या दिवालियापन कानून की मूल भावना के खिलाफ जा सकती है।
इस निर्णय के निहितार्थ व्यापक हैं। अगर कंपनियां तकनीकी रूप से सहयोगी नहीं मानी जाती हैं, तो वे दिवालियापन प्रक्रिया में स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती हैं और पुनर्निर्माण योजनाओं को प्रभावित कर सकती हैं। इससे ऋणदाताओं और अन्य हितधारकों के हितों पर असर पड़ सकता है।
क्षेत्रीय विश्लेषकों के अनुसार, IBC में इस तरह की खामियां अन्य मामलों में भी सामने आ सकती हैं। विधायकों और न्यायिक विशेषज्ञों को इस मुद्दे पर गहराई से विचार करना चाहिए ताकि भविष्य में दिवालियापन कानून का दुरुपयोग न हो सके।