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सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की याचिका खारिज की, AIF-FPI मालिकाना हक प्रकटीकरण पर
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वर्तमान में वैकल्पिक निवेश कोष और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के लाभकारी मालिकों के सार्वजनिक प्रकटीकरण के लिए कोई कानूनी या नियामक ढांचा नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका आदेश सेबी और केंद्र सरकार को नीति बनाने से नहीं रोकेगा।
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नई दिल्ली - भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के लाभकारी मालिकों के सार्वजनिक प्रकटीकरण को अनिवार्य बनाने की मांग की गई थी। न्यायालय के इस निर्णय से केंद्र सरकार और भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (SEBI) को नीति निर्माण में बाधा नहीं आएगी।
कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, वर्तमान समय में AIF और FPI के स्वामित्व की जानकारी को सार्वजनिक करने के लिए कोई विशिष्ट कानूनी या नियामक प्रावधान मौजूद नहीं है। यह अधिकार क्षेत्र की रिक्तता नियामक निकायों को इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में नए नियम बनाने की जिम्मेदारी देती है।
न्यायालय का यह रुख दर्शाता है कि पारदर्शिता और जवाबदेही के मुद्दों को सुलझाने की जिम्मेदारी संबंधित कार्यपालिका और नियामक एजेंसियों पर है। SEBI अब इस दिशा में आवश्यक नीति ढांचा तैयार कर सकता है।
यह निर्णय विदेशी और वैकल्पिक निवेश क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने की व्यापक बहस के बीच आया है। सरकार और नियामकों के पास अब इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में सुधार लाने का स्पष्ट अधिकार है।