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भाषण की स्वतंत्रता बनाम विधायी विशेषाधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्थगित हो सकता है
सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ भाषण की स्वतंत्रता और विधायी विशेषाधिकार के बीच विवाद पर फैसले को स्थगित कर सकती है। सॉलिसिटर जनरल और अटॉर्नी जनरल दोनों ने माना है कि यह मुद्दा अब अकादमिक हो गया है।
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नई दिल्ली - सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ नागरिकों के भाषण की स्वतंत्रता के अधिकार और संसद सदस्यों के विधायी विशेषाधिकार के बीच विवाद पर अपना निर्णय स्थगित कर सकती है। न्यायिक कार्यवाही के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दोनों ने इस संभावना को स्वीकार किया।
दोनों वरिष्ठ कानूनी अधिकारियों का मत था कि मामले के मूल विवाद अब केवल सैद्धांतिक महत्व के रह गए हैं। उन्होंने माना कि परिस्थितियों में बदलाव के कारण यह मामला अपनी वास्तविक प्रासंगिकता खो चुका है। इस स्वीकृति ने पीठ को फैसला स्थगित करने की दिशा में मजबूर किया है।
यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 में निहित विधायी विशेषाधिकार के दायरे से संबंधित था। विशेषाधिकार के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर कितनी सीमा लागू की जा सकती है, इस प्रश्न पर अदालत विचार कर रही थी।
पीठ की यह कार्यवाही कानूनी विशेषज्ञों के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है, क्योंकि यह दर्शाता है कि कभी-कभी संवैधानिक मुद्दे सामाजिक परिवर्तन के साथ अपनी तात्कालिकता खो जाते हैं।