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झूठे विवाद में 11 साल बर्बाद करने पर सुप्रीम कोर्ट ने पक्षों को दंडित किया
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब पक्षों को सच पता हो तो न्यायाधीश ही परीक्षा पर होता है। कोर्ट ने प्रत्येक पक्ष को पांच लाख रुपये जुर्माना लगाया है।
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नई दिल्ली - भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जब विवाद के पक्षों को सच्चाई मालूम हो, तब न्यायाधीश ही परीक्षण पर होता है। यह टिप्पणी कोर्ट ने उस मामले में की जहां दोनों पक्षों ने जानबूझकर 11 साल तक न्यायालय का समय बर्बाद किया था।
न्यायालय ने निर्धारित किया कि विवाद पूरी तरह से 'निर्मित' था और इसका कोई वास्तविक आधार नहीं था। कोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ऐसे झूठे केस से असली मुकदमेबाजों को नुकसान होता है जो अपनी बारी का इंतजार करते हैं।
इस कदम में न्यायालय ने अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में प्रत्येक पक्ष को पांच लाख रुपये की वित्तीय पेनल्टी लगाई है। यह राशि न्यायिक समय की बर्बादी के लिए लागत के रूप में तय की गई है।
न्यायालय का यह निर्णय न्याय प्रणाली की अखंडता को सुरक्षित रखने और झूठे या तुच्छ मुकदमों को हतोत्साहित करने की दिशा में एक मजबूत संदेश है। सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख यह सुनिश्चित करता है कि वास्तविक पीड़ितों और वैध मुकदमेबाजों को न्याय की प्रक्रिया में देरी न हो।