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यूपीआई एमडीआर शुल्क पर सुप्रीम कोर्ट की सरकार से कड़ी पूछताछ
सर्वोच्च न्यायालय ने यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) शुल्क को लेकर सरकार से सवाल किया है कि यह न तो कर है और न ही शुल्क, तो फिर यह कौन सा अधिकार है। अदालत ने अंतरिम स्थगन की याचिका को खारिज किया है लेकिन मामले में नोटिस जारी किया है।
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नई दिल्ली - सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल भुगतान प्रणाली यूपीआई पर एमडीआर शुल्क लगाने को लेकर केंद्र सरकार से तीखे सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने सुनवाई के दौरान कहा कि अगर यह शुल्क न तो कर है और न ही सरकारी फीस, तो इसे किस आधार पर लगाया जा रहा है। इस सवाल ने सरकार की नीति के औचित्य पर सीधा सवालिया निशान लगाया है।
योजना के खिलाफ दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता की अंतरिम स्थगन की मांग को खारिज कर दिया है। हालांकि, अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार को नोटिस जारी किया है। इसका अर्थ है कि सरकार को याचिका पर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का मौका दिया जाएगा।
यूपीआई, जो देश में लाखों लोगों द्वारा दैनिक लेनदेन के लिए उपयोग की जाने वाली डिजिटल भुगतान प्रणाली है, पर एमडीआर शुल्क का विवाद पिछले कुछ महीनों से चल रहा है। मामला यह भी उजागर करता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में सरकार के नियामक अधिकारों की सीमाएं क्या होनी चाहिए।
अदालत के सवाल से स्पष्ट है कि न्यायालय इस मुद्दे पर गहराई से विचार करेगा और सरकार को अपने निर्णय का संवैधानिक आधार स्पष्ट करना होगा। यह फैसला भारत की डिजिटल भुगतान नीति के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।