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विधानसभा का शेष कार्यकाल अयोग्यता याचिका में देरी का कारण नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के अध्यक्ष को कांग्रेस विधायक निर्मला सपरे की अयोग्यता याचिका का फैसला दो महीने में करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में तेजी से निर्णय लेना आवश्यक है।
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विधानसभा के शेष कार्यकाल को अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निर्णय लेने में देरी का बहाना नहीं बनाया जा सकता। यह निर्देश मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के संदर्भ में दिया गया है, जिन्हें कांग्रेस की विधायक निर्मला सपरे की अयोग्यता संबंधी याचिका पर तय समय सीमा के भीतर फैसला करना होगा।
कोर्ट ने दो महीने की स्पष्ट समय सीमा निर्धारित करते हुए कहा है कि विधानसभा के कार्यकाल की अवधि याचिका के निपटान में विलंब के लिए एक कारण नहीं हो सकता। अदालत का मानना है कि संविधान के प्रावधानों के अनुसार ऐसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों को दक्षतापूर्वक और समय पर कार्य करना चाहिए।
यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 192 के तहत दिया गया है, जो विधायकों की अयोग्यता से संबंधित है। अदालत की ओर से यह संदेश स्पष्ट है कि ऐसी याचिकाओं को अनिश्चितकाल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता और विधानसभा अध्यक्ष को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिए।
इस मामले का निर्णय दलबदल विरोधी कानूनों के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्देश भविष्य में इसी तरह की याचिकाओं के निपटान में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करेगा।