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संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को बरकरार रखा सुप्रीम कोर्ट
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 25 नवंबर को एक महत्वपूर्ण फैसले में संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों के समावेश को वैध ठहराया। यह शब्द 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से जोड़े गए थे।
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम निर्णय में संविधान की प्रस्तावना में 1976 के 42वें संवैधानिक संशोधन के जरिए शामिल किए गए 'समाजवादी' और 'धर्मनिरपेक्ष' शब्दों को बरकरार रखने का समर्थन किया है। इस फैसले से भारतीय संविधान की मूल संरचना को लेकर लंबे समय से चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है।
42वां संवैधानिक संशोधन तत्कालीन सरकार द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान पारित किया गया था। इसी संशोधन के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना में ये दोनों महत्वपूर्ण शब्द जोड़े गए थे, जो भारतीय राज्य के आदर्शों को परिभाषित करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का महत्व इस बात में निहित है कि यह भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को कानूनी रूप से मजबूत करता है। यह निर्णय संवैधानिक कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है।
इस फैसले के साथ ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना की व्याख्या को लेकर विभिन्न कानूनी और राजनीतिक मंचों पर चल रही चर्चाओं में नई गति आने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक ढांचे की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।