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टाटा संस विभाजन कानूनी रास्ता दिखा सकता है, लेकिन आरबीआई की मंजूरी अभी भी बाधा
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एनसीएलटी द्वारा अनुमोदित पुनर्गठन संभव हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में आरबीआई की आवश्यकताओं को रद्द नहीं करेगा और न ही सूचीबद्धता के दायित्व को हटाएगा।
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टाटा संस के संभावित विभाजन को लेकर चल रही बहस में विधिक विशेषज्ञ एक महत्वपूर्ण सूक्ष्मता की ओर इशारा कर रहे हैं। जबकि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के माध्यम से अनुमोदित पुनर्गठन कानूनी दृष्टिकोण से व्यवहार्य हो सकता है, यह भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की नियामक आवश्यकताओं से स्वतः ही मुक्ति नहीं दिलाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी कानूनी पुनर्गठन प्रक्रिया को वित्तीय नियमन से संबंधित आरबीआई के मौजूदा दिशानिर्देशों का पालन करना होगा। यह विभाजन योजना को केवल कॉर्पोरेट ढांचागत स्तर पर मंजूरी देने के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि केंद्रीय बैंकिंग प्राधिकरण की संतुष्टि भी आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, टाटा संस पर सूचीबद्धता संबंधी दायित्व बने रहेंगे जो विभाजन प्रक्रिया से प्रभावित नहीं होंगे। कानूनी पुनर्गठन इन नियामक अनिवार्यताओं को दरकिनार नहीं कर सकता।
विश्लेषकों का मानना है कि टाटा संस को किसी भी संरचनात्मक परिवर्तन से पहले आरबीआई समेत सभी प्रासंगिक नियामक निकायों की पूर्वानुमति प्राप्त करनी होगी। यह प्रक्रिया कानूनी अनुमोदन प्राप्त करने जितनी ही जटिल साबित हो सकती है।