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सूचना का अधिकार कानून को केंद्र ने कमजोर किया: कार्यकर्ता
सूचना का अधिकार कानून को लागू किए दो दशक बाद इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। वर्ष 2019 के संशोधन के बाद केंद्र को सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन पर नियंत्रण मिल गया है।
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सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून की स्थापना के बीस साल बाद इसकी कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। सूचना के अधिकार के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं का मानना है कि डिजिटलीकरण के नाम पर लॉगिन प्रणाली ने नागरिकों की पारदर्शिता तक पहुंच को सीमित कर दिया है। कानून को मजबूत करने के बजाय सरकार ने उसे कमजोर करने का रास्ता चुना है।
2019 के संविधान संशोधन के माध्यम से केंद्र सरकार को सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन निर्धारण का अधिकार दे दिया गया। यह कदम सूचना आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के सिद्धांत पर सीधा प्रहार है। विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के नियंत्रण से आयुक्त सरकारी दबाव में काम करने के लिए मजबूर हो सकते हैं।
मानवाधिकार और पारदर्शिता के क्षेत्र में काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि इस प्रवृत्ति को जारी रहने दिया गया तो आरटीआई कानून की मूल भावना समाप्त हो जाएगी। नागरिक जवाबदेही और सुशासन के लिए सूचना की स्वतंत्र पहुंच अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में कानून को मजबूत करने और आयुक्तों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।