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विधान परिषदें क्या भूमिका निभाती हैं? जानिए संवैधानिक आधार
भारत के कई राज्यों में विधान परिषदें राज्य विधानमंडल का द्वितीय सदन हैं। संविधान में इनकी स्थापना के पीछे क्या तर्क हैं और इनकी शक्तियां क्या हैं, यह समझना महत्वपूर्ण है।
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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 168 के तहत राज्यों में विधान परिषदों की व्यवस्था की गई है। ये सदन विधान सभाओं के साथ राज्य विधानमंडल का हिस्सा होते हैं और मुख्य रूप से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संतुलन बनाने का काम करते हैं। वर्तमान समय में भारत के नौ राज्यों में विधान परिषदें मौजूद हैं।
विधान परिषद के सदस्य विभिन्न तरीकों से चुने जाते हैं या नामांकित किए जाते हैं। इनमें विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित सदस्य, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि, शिक्षकों और साहित्य एवं विज्ञान क्षेत्र के विशेषज्ञों का समावेश होता है। राज्यपाल द्वारा भी कुछ सदस्यों को नामांकित किया जाता है।
विधान परिषद की शक्तियां विधान सभा की तुलना में सीमित होती हैं। धन विधेयकों पर इसके पास विशेष प्रभाव नहीं होता, लेकिन अन्य विधेयकों पर यह 14 दिन के लिए विचार-विमर्श रोक सकती है। यह सदन नीति-निर्माण में महत्वपूर्ण विचार-विमर्श का मंच प्रदान करता है।
इस संस्था के औचित्य को लेकर विचार विभाजित हैं। समर्थकों का मानना है कि यह अनुभवी और विद्वान व्यक्तियों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देता है, जबकि आलोचक इसे अनावश्यक खर्च और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को कम करने वाली संस्था मानते हैं। प्रशासनिक सुधार आयोग ने इस संस्था के कामकाज में सुधार के लिए कई सुझाव दिए थे, जिनमें सदस्यों की योग्यता में वृद्धि और पारदर्शिता लाना शामिल है।